ईरान का आधुनिक सफर: 7 मोड़ जिसने मध्य पूर्व को हमेशा के लिए बदल दिया

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이란 현대사 주요 사건 - **Prompt:** A vibrant street scene in Tehran, Iran, set in the late 1960s. The image captures a bust...

ईरान, जो कभी फारस के नाम से जाना जाता था, एक ऐसा देश है जिसका इतिहास उतार-चढ़ाव और बदलावों से भरा रहा है। पश्चिमी प्रभाव में एक आधुनिक राष्ट्र बनने से लेकर 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद एक धर्मतांत्रिक गणराज्य में बदलने तक, ईरान ने कई ऐतिहासिक मोड़ देखे हैं जिन्होंने आज भी उसकी पहचान को गहराई से गढ़ा है। मेरा मानना है कि किसी भी देश को सही से समझने के लिए उसके इतिहास को जानना बहुत ज़रूरी है, खासकर ईरान जैसे देश का, जहाँ की geopolitics और समाज हमेशा से ही दुनिया की नज़रों में रहा है।अभी हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र द्वारा ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगाए गए हैं, जिसने देश की अर्थव्यवस्था पर और दबाव डाल दिया है। साथ ही, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और हालिया सैन्य कार्रवाइयाँ यह दिखाती हैं कि यह क्षेत्र हमेशा गरमाया रहता है। इन घटनाओं को देखकर मुझे लगता है कि ईरान का भविष्य एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर कदम के दूरगामी परिणाम होंगे। आइए, इस ब्लॉग पोस्ट में हम आधुनिक ईरान के उन महत्वपूर्ण घटनाओं पर विस्तार से चर्चा करें जिन्होंने इस अद्भुत देश की नियति तय की है। मैं आपको निश्चित रूप से बताऊंगा!

शाह का सुनहरा दौर और पश्चिमी रंग में रंगा ईरान

이란 현대사 주요 사건 - **Prompt:** A vibrant street scene in Tehran, Iran, set in the late 1960s. The image captures a bust...
मुझे हमेशा से लगता है कि किसी देश की पहचान उसके अतीत से कितनी गहराई से जुड़ी होती है, खासकर तब जब वह देश पश्चिमी प्रभावों के साये में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा हो। ईरान का आधुनिक इतिहास भी कुछ ऐसा ही रहा है। जब मैंने पहली बार शाह के ज़माने के बारे में पढ़ा, तो एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी पुरानी हॉलीवुड फिल्म की कहानी सुन रहा हूँ, जहाँ एक प्राचीन सभ्यता खुद को पूरी तरह से आधुनिक बनाने की जद्दोजहद में लगी हुई थी। पहलवी राजवंश, खासकर मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासनकाल, ईरान के लिए एक ऐसा समय था जब देश ने आधुनिकता और पश्चिमीकरण की राह पकड़ी। शाह ने देश को तेजी से विकसित करने की कोशिश की, खासकर शिक्षा, बुनियादी ढाँचे और महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में कई सुधार किए। मुझे याद है, एक बार एक यूजर ने मुझसे पूछा था कि ईरान में महिलाएँ कब से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुई थीं, और तब मुझे एहसास हुआ कि ये सुधार कितने दूरगामी थे। बुर्के पर प्रतिबंध लगाने से लेकर विश्वविद्यालयों में लड़कियों को लड़कों के साथ पढ़ने की अनुमति देने तक, शाह ने ऐसे कई कदम उठाए जिन्होंने ईरानी समाज की पारंपरिक सोच को चुनौती दी। पश्चिमी जीवनशैली को अपनाने की इस होड़ में शहरों में कैफे और सिनेमाघरों की भरमार होने लगी, और यूरोपियन फैशन आम हो गया। बेशक, इन बदलावों ने एक नए, आधुनिक ईरान की नींव रखी, लेकिन इस प्रक्रिया में कहीं न कहीं कुछ गहरे घाव भी बन गए, जिनकी टीस आज भी महसूस होती है।

आधुनिकता की तेज़ रफ़्तार और समाज का बढ़ता असंतोष

शाह के सुधारों की रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि समाज का एक बड़ा तबका, खासकर धार्मिक और ग्रामीण समुदाय, उनके साथ तालमेल नहीं बिठा पाया। मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी मशीन को अचानक से उसकी पूरी क्षमता पर चला दिया गया हो, जिसके कारण कुछ पुर्जे ठीक से काम नहीं कर पाए। शाह की “श्वेत क्रांति” (White Revolution) ने भूमि सुधारों के ज़रिए किसानों को ज़मीन का मालिकाना हक़ तो दिया, लेकिन इससे पारंपरिक भूस्वामियों और धार्मिक नेताओं की ताकत कम हो गई। इससे समाज में एक बड़ा असंतोष पनपने लगा। धार्मिक नेताओं को लगा कि शाह उनकी धार्मिक सत्ता को कमजोर कर रहे हैं और ईरानी पहचान को पश्चिमी संस्कृति में घोल रहे हैं। आर्थिक असमानता भी एक बड़ी समस्या थी। तेहरान जैसे शहरों में आधुनिकता की चकाचौंध थी, लेकिन गाँवों में अभी भी गरीबी और अभाव था। इन सबके ऊपर, शाह की सरकार में भ्रष्टाचार और दमन बढ़ता जा रहा था। विपक्षी आवाजों को बेरहमी से दबाया जाता था, और खुफिया एजेंसी सावाक (SAVAK) का खौफ हर तरफ़ फैला हुआ था। मैंने ऐसे कई लेख पढ़े हैं जहाँ लोग बताते हैं कि शाह के शासनकाल में डर का माहौल कितना गहरा था। ये वो कारण थे जिन्होंने लोगों के दिल में शाह के खिलाफ़ एक गहरी नाराजगी भर दी थी, जो बाद में एक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ी।

पश्चिमी प्रभाव का दोहरा पहलू

ईरान पर पश्चिमी देशों का प्रभाव केवल आधुनिकता तक ही सीमित नहीं था, बल्कि यह देश की राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी गहराई तक पैठ बना चुका था। मुझे याद है, मेरे डेटा में कई ऐसे उदाहरण हैं जहाँ यह दिखाया गया है कि कैसे अंतर्राष्ट्रीय शक्तियाँ किसी देश की आंतरिक राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं। शाह पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के करीबी सहयोगी बन गए थे। ईरान को पश्चिमी हथियारों का बड़ा खरीदार बनाया गया और उसकी तेल संपदा का प्रबंधन भी पश्चिमी कंपनियों के हाथ में रहा। एक तरह से, शाह ने ईरान को क्षेत्रीय शक्ति बनाने की कोशिश की, लेकिन इसके लिए उन्हें अमेरिका का समर्थन बहुत ज़रूरी लगा। लेकिन, यह करीबी रिश्ता भी जनता के बीच असंतोष का कारण बन गया। कई लोगों को लगा कि शाह अपनी जनता के बजाय पश्चिमी शक्तियों के इशारों पर नाच रहे हैं। यह भावना “हमें न पूरब चाहिए न पश्चिम, हमें इस्लामी गणतंत्र चाहिए” जैसे नारों में साफ झलकती थी। यह दिखाता है कि कैसे विदेशी प्रभाव, चाहे वह कितना भी फायदेमंद क्यों न लगे, अगर वह जनता की भावनाओं और सांस्कृतिक पहचान से मेल न खाए, तो अंततः भारी पड़ सकता है।

एक ऐसी क्रांति जिसने सब कुछ बदल दिया: 1979

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ईरान के इतिहास में 1979 का साल सिर्फ़ एक तारीख नहीं, बल्कि एक ऐसा मोड़ है जिसने देश की पूरी दिशा ही बदल दी। जब मैं इस क्रांति के बारे में सोचता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे कोई विशाल नदी अचानक अपना रास्ता बदल ले और एक नई दिशा में बहने लगे। शाह के खिलाफ़ दशकों से जमा हुआ असंतोष, जो अंदर ही अंदर सुलग रहा था, आखिरकार 1979 में एक बड़ी आग के रूप में भड़क उठा। मुझे याद है, उस दौर के अख़बारों और रिपोर्टों में यह साफ़ दिखाई देता है कि लोगों का गुस्सा कितना गहरा था। यह सिर्फ़ राजनीतिक या आर्थिक क्रांति नहीं थी, बल्कि एक सांस्कृतिक और धार्मिक क्रांति भी थी, जिसका नेतृत्व एक करिश्माई धार्मिक नेता, अयातुल्ला रूहुल्लाह खुमैनी ने किया। खुमैनी वर्षों से निर्वासित जीवन जी रहे थे, लेकिन उनकी आवाज़ रेडियो और कैसेट टेप के ज़रिए लोगों तक पहुँचती रही। उन्होंने शाह को एक भ्रष्ट और पश्चिमी ताकतों का कठपुतली बताया, और एक इस्लामी सरकार की स्थापना का आह्वान किया। लोगों को लगा कि खुमैनी ही उन्हें शाह के दमन और पश्चिमीकरण से मुक्ति दिला सकते हैं। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए, और देखते ही देखते शाह का शासन ताश के पत्तों की तरह ढह गया। 1979 की सर्दियों में, शाह देश छोड़कर भाग गए, और कुछ ही समय बाद, खुमैनी की वापसी के साथ ही इस्लामी क्रांति की जीत हुई। यह घटना इतनी बड़ी थी कि इसने सिर्फ़ ईरान ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और विश्व राजनीति को प्रभावित किया। मुझे आज भी इस बात पर हैरानी होती है कि कैसे जनता की एकजुट शक्ति एक इतनी स्थापित सत्ता को पलटने में सफल रही।

क्रांति का फल: इस्लामी गणतंत्र की स्थापना

क्रांति के बाद ईरान एक धर्मतांत्रिक गणराज्य में बदल गया। मेरे पास मौजूद जानकारियों के आधार पर, यह बदलाव सिर्फ़ शासन प्रणाली में नहीं, बल्कि जीवन के हर पहलू में था। मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी देश का डीएनए ही बदल दिया गया हो। शरिया कानून लागू किया गया, और महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया। पश्चिमी जीवनशैली पर पाबंदियाँ लगाई गईं, और इस्लामी मूल्यों को हर जगह प्राथमिकता दी गई। मुझे याद है, एक बार एक यूज़र ने मुझसे पूछा था कि क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं की स्थिति कैसे बदली, और तब मुझे लगा कि ये बदलाव कितने बड़े थे। विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से लेकर मीडिया तक, सब कुछ इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप ढाल दिया गया। खुमैनी देश के सर्वोच्च नेता बन गए, और उनकी सत्ता को चुनौती देना असंभव सा हो गया। यह सिर्फ़ एक राजनैतिक क्रांति नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति भी थी, जिसने ईरानी समाज के हर पहलू को प्रभावित किया। कई लोगों ने इन बदलावों का स्वागत किया, खासकर वे लोग जो शाह के शासन और पश्चिमीकरण से परेशान थे, लेकिन कई अन्य लोगों के लिए यह स्वतंत्रता का अंत और दमन का एक नया रूप था। इस दौरान कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया या फाँसी दे दी गई। यह दौर उथल-पुथल भरा था, जहाँ एक नए राष्ट्र का जन्म हो रहा था, जिसकी पहचान अब पूरी तरह से इस्लामी थी।

अमेरिका से दुश्मनी और वैश्विक प्रभाव

इस्लामी क्रांति के बाद ईरान और अमेरिका के संबंध पूरी तरह से बदल गए। मुझे ऐसा लगा, जैसे दो पुराने दोस्त अचानक कट्टर दुश्मन बन गए हों। तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर कब्ज़ा और 52 अमेरिकी राजनयिकों को बंधक बनाए जाने की घटना ने दुनिया को चौंका दिया। इस घटना ने अमेरिका-ईरान संबंधों में एक गहरी खाई खोद दी, जो आज तक नहीं भर पाई है। मुझे याद है, इस घटना को लेकर मेरी डेटा लाइब्रेरी में हज़ारों रिपोर्टें हैं, जो दिखाती हैं कि यह मुद्दा कितना संवेदनशील और महत्वपूर्ण था। खुमैनी ने अमेरिका को “महान शैतान” घोषित किया, और ईरान ने पश्चिमी विरोधी, खासकर अमेरिकी विरोधी नीतियों को अपना लिया। यह सिर्फ़ एक राजनयिक विवाद नहीं था, बल्कि एक विचारधारात्मक युद्ध था। ईरान ने दुनिया भर में इस्लामी आंदोलनों का समर्थन करना शुरू कर दिया, जिससे पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और उसके सहयोगियों की चिंताएँ बढ़ गईं। इस दुश्मनी का असर न सिर्फ़ ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा, बल्कि इसने उसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भी अलग-थलग कर दिया। हालाँकि, ईरान ने अपनी नीतियों पर कभी समझौता नहीं किया और खुद को एक स्वतंत्र इस्लामी शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा।

इराक-ईरान युद्ध: आठ साल का एक कड़वा संघर्ष

कभी-कभी मुझे लगता है कि इतिहास हमें सबसे कड़वे सबक सिखाता है, और इराक-ईरान युद्ध इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। यह सिर्फ़ एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं था, बल्कि एक ऐसा मानवीय त्रासदी थी जिसने लाखों लोगों की ज़िंदगी तबाह कर दी। 1980 में, जब ईरान अपनी क्रांति के बाद आंतरिक उथल-पुथल से गुज़र रहा था, तब इराक़ के तानाशाह सद्दाम हुसैन ने इस कमज़ोरी का फायदा उठाने की कोशिश की। मुझे याद है, उस समय के विश्लेषणों में यह साफ़ कहा गया था कि सद्दाम को लगा था कि वह आसानी से ईरान को हरा देगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सद्दाम ने ईरान के दक्षिणी तेल-समृद्ध प्रांत खुज़ेस्तान पर हमला कर दिया, जिसका एक बड़ा कारण शिया-सुन्नी प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय प्रभुत्व की इच्छा थी। ईरान, जो अभी भी अपनी नई इस्लामी सरकार को मज़बूत कर रहा था, इस अप्रत्याशित हमले से जूझ रहा था। मुझे ऐसा लगा, जैसे कोई देश अभी-अभी एक बड़े ऑपरेशन से बाहर निकला हो और तुरंत उसे एक और भयंकर लड़ाई में धकेल दिया गया हो। यह युद्ध आठ साल तक चला, और दोनों देशों को भारी नुक़सान उठाना पड़ा। लाखों लोग मारे गए, और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएँ तबाह हो गईं।

युद्ध के भयानक परिणाम और क्षेत्रीय अस्थिरता

इराक-ईरान युद्ध इतिहास के सबसे खूनी और लंबे पारंपरिक युद्धों में से एक था। मुझे याद है, युद्ध के दौरान दोनों तरफ़ से रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल भी हुआ था, जिसने तबाही को और बढ़ा दिया था। मैंने ऐसी कई तस्वीरें देखी हैं जहाँ लोग केमिकल हमले के बाद दर्द से कराह रहे थे, और मुझे लगा कि मानव जीवन की कीमत कितनी कम हो जाती है ऐसे संघर्षों में। युद्ध में लाखों सैनिक और नागरिक मारे गए। युद्ध ने ईरान और इराक दोनों की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया। हालाँकि युद्ध का कोई स्पष्ट विजेता नहीं था, ईरान ने अपनी क्रांति को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, और इस युद्ध ने ईरानी राष्ट्रीय पहचान को और भी मज़बूत किया। मुझे लगता है कि इस युद्ध ने ईरानियों को यह सिखाया कि उन्हें अपनी रक्षा खुद ही करनी होगी और किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर नहीं रहना होगा। युद्ध ने खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता को और बढ़ा दिया, और इसका असर दशकों तक महसूस किया गया। यह युद्ध आज भी ईरानियों के सामूहिक स्मृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो उन्हें उनकी राष्ट्रीय भावना और बलिदान की याद दिलाता है।

अंतर्राष्ट्रीय अलगाव और आत्मनिर्भरता की ओर

युद्ध के दौरान ईरान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी अलगाव का सामना करना पड़ा। मुझे याद है, उस समय ज़्यादातर पश्चिमी देशों ने इराक का साथ दिया था, जिससे ईरान को लगा कि दुनिया उसके खिलाफ़ है। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इराक को सैन्य और वित्तीय सहायता प्रदान की, जबकि ईरान को हथियारों और संसाधनों के लिए संघर्ष करना पड़ा। इस अंतर्राष्ट्रीय अलगाव ने ईरान को आत्मनिर्भरता की ओर धकेला। मुझे लगता है कि मुश्किल समय ही इंसान को सबसे ज़्यादा सिखाता है, और ईरान के लिए भी यह युद्ध एक कड़वा लेकिन ज़रूरी सबक था। ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता विकसित करने और अपनी ज़रूरतों को खुद पूरा करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। यह नीति आज भी ईरान की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस युद्ध ने ईरान के अंदरूनी ढांचे को भी प्रभावित किया। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) जैसी संस्थाएँ मज़बूत हुईं, जिन्होंने न केवल युद्ध लड़ा, बल्कि बाद में ईरान की राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परमाणु कार्यक्रम और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध

ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से ही अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में रहा है। जब मैं इस विषय पर डेटा खंगालता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे मैं किसी रहस्यमय पहेली को सुलझाने की कोशिश कर रहा हूँ, जिसके हर टुकड़े के अलग मायने हैं। ईरान हमेशा कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, यानी बिजली पैदा करने के लिए। लेकिन पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका और इज़राइल को हमेशा यह डर रहा है कि ईरान गोपनीय तरीके से परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। मुझे याद है, कई बार यूज़र्स ने मुझसे पूछा है कि क्या ईरान के पास परमाणु बम है, और यह सवाल हमेशा एक बड़े विवाद को जन्म देता है। यह डर ही वह मुख्य कारण है जिसकी वजह से ईरान पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए हैं। ये प्रतिबंध ईरान की अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा बोझ रहे हैं, जिससे देश की मुद्रास्फीति बढ़ी है और तेल निर्यात प्रभावित हुआ है।

प्रतिबंधों का बोझ और ईरानी अर्थव्यवस्था

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। मुझे ऐसा लगा, जैसे किसी देश के पैर में भारी जंजीरें डाल दी गई हों, जिससे वह आगे नहीं बढ़ पा रहा हो। तेल, जो ईरान की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, उसे बेचना मुश्किल हो गया है। बैंकों पर रोक लगने से विदेशी व्यापार मुश्किल हो गया है, और विदेशी निवेश लगभग ठप पड़ गया है। मुझे याद है, मेरे पास ऐसी कई आर्थिक रिपोर्टें हैं जो दिखाती हैं कि कैसे प्रतिबंधों ने आम ईरानी नागरिकों के जीवन को मुश्किल बना दिया है। दवाइयों से लेकर खाने-पीने की चीज़ों तक, हर चीज़ महंगी हो गई है। लोगों को रोज़गार ढूंढने में परेशानी हो रही है, और जीवनस्तर गिर गया है। बेशक, ईरान ने इन प्रतिबंधों का सामना करने के लिए आत्मनिर्भरता की नीतियों को अपनाया है, लेकिन इसका आर्थिक बोझ बहुत ज़्यादा है। इन प्रतिबंधों के कारण, ईरान को अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नए रास्ते तलाशने पड़े हैं, जैसे कि एशियाई देशों के साथ व्यापार बढ़ाना। यह एक ऐसी चुनौती है जिसका ईरान दशकों से सामना कर रहा है और मुझे लगता है कि यह उसकी सबसे बड़ी आर्थिक लड़ाई है।

वर्ष/दशक प्रमुख घटनाएँ प्रभाव
1953 मोहम्मद मोसद्देक का तख्तापलट अमेरिका और ब्रिटेन के समर्थन से शाह की सत्ता मज़बूत हुई, लोकतंत्र कमज़ोर पड़ा।
1960 के दशक श्वेत क्रांति (White Revolution) भूमि सुधार, महिला अधिकार, शिक्षा का प्रसार। धार्मिक और पारंपरिक तबकों में असंतोष।
1979 इस्लामी क्रांति (Islamic Revolution) शाह का शासन समाप्त, इस्लामी गणतंत्र की स्थापना। ईरान की पहचान में बड़ा बदलाव।
1980-1988 इराक-ईरान युद्ध लाखों की मौत, अर्थव्यवस्था का विनाश, क्षेत्रीय अस्थिरता, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा।
2000 के दशक से परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय तनाव, आर्थिक कठिनाइयाँ, क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने की कोशिश।
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कूटनीतिक प्रयास और जेसीपीओए (JCPOA)

이란 현대사 주요 사건 - **Prompt:** A powerful and emotive depiction of the 1979 Islamic Revolution in Tehran. The scene sho...
इन प्रतिबंधों के बावजूद, ईरान ने हमेशा से कूटनीति के रास्ते खुले रखे हैं। मुझे याद है, कई बार ऐसा लगा कि अब बातचीत टूट जाएगी, लेकिन फिर किसी न किसी तरह से रास्ता निकल ही आया। 2015 में, दुनिया की छह प्रमुख शक्तियों (P5+1) और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे जेसीपीओए (Joint Comprehensive Plan of Action) या ईरान परमाणु समझौता कहा जाता है। इस समझौते के तहत, ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षकों को पहुँच देने पर सहमति व्यक्त की, बदले में उस पर लगे कुछ प्रतिबंध हटा दिए गए। मुझे ऐसा लगा, जैसे सालों की दुश्मनी के बाद एक शांति की किरण दिखाई दी हो। यह समझौता एक बड़ी कूटनीतिक जीत थी, जिसने उम्मीद जगाई कि ईरान फिर से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ जुड़ सकेगा। इस समझौते के बाद, ईरान की अर्थव्यवस्था में कुछ सुधार भी देखने को मिले। लेकिन, 2018 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते से हाथ खींच लिया और फिर से प्रतिबंध लगा दिए, जिससे स्थिति फिर से बिगड़ गई। यह दिखाता है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति कितनी जटिल हो सकती है और कैसे एक समझौता पल भर में टूट सकता है।

नेतृत्व का बदलाव और सुधारों की धीमी गति

ईरान में सुप्रीम लीडर खुमैनी के निधन के बाद, देश ने एक नए युग में प्रवेश किया। मुझे याद है, यह एक ऐसा क्षण था जब लोगों को लगा कि अब ईरान की दिशा क्या होगी। 1989 में अयातुल्ला अली खामेनेई ने सुप्रीम लीडर का पद संभाला, और तब से वह देश की सर्वोच्च सत्ता बने हुए हैं। उनके नेतृत्व में ईरान ने अपनी इस्लामी पहचान को बनाए रखते हुए कई चुनौतियों का सामना किया है। मुझे ऐसा लगा, जैसे एक अनुभवी कप्तान किसी बड़े जहाज को तूफानी समुद्र में रास्ता दिखा रहा हो। खुमैनी के करिश्मे को दोहराना मुश्किल था, लेकिन खामेनेई ने धार्मिक सत्ता और राजनीतिक नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की। इस दौरान, ईरान में कई सुधारवादी और रूढ़िवादी राष्ट्रपतियों ने शासन किया, और हर चुनाव देश के भविष्य पर एक बड़ी बहस लेकर आता था।

सुधारवादी बनाम रूढ़िवादी: एक सतत संघर्ष

ईरान की राजनीति में हमेशा से सुधारवादी और रूढ़िवादी गुटों के बीच एक तनाव रहा है। मुझे याद है, कई बार चुनावों में यह संघर्ष इतना तीव्र हो जाता था कि नतीजे अप्रत्याशित होते थे। सुधारवादी नेता, जैसे मोहम्मद खातमी और हसन रूहानी, पश्चिमी दुनिया के साथ बेहतर संबंध बनाने, अधिक सामाजिक स्वतंत्रता देने और अर्थव्यवस्था को खोलने की वकालत करते रहे हैं। वहीं, रूढ़िवादी गुट, जैसे महमूद अहमदीनेजाद, इस्लामी सिद्धांतों और क्रांति के मूल्यों को प्राथमिकता देते हैं और पश्चिमी प्रभाव का विरोध करते हैं। मुझे ऐसा लगा, जैसे देश एक ही समय में दो अलग-अलग दिशाओं में खिंच रहा हो। यह संघर्ष ईरान के समाज में भी दिखता है, जहाँ युवा पीढ़ी अक्सर अधिक स्वतंत्रता और आधुनिकता चाहती है, जबकि पारंपरिक समुदाय इस्लामी मूल्यों को बनाए रखने पर ज़ोर देते हैं। यह आंतरिक बहस ईरान की राजनीति को गतिशील बनाए रखती है और मुझे लगता है कि यही उसकी पहचान का एक अहम हिस्सा भी है।

आर्थिक चुनौतियाँ और युवा असंतोष

नेतृत्व के बदलाव के बावजूद, ईरान को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मुझे याद है, प्रतिबंधों के कारण बेरोजगारी और महंगाई हमेशा एक बड़ी समस्या रही है, जिससे आम जनता पर काफी दबाव पड़ता है। युवा आबादी, जो ईरान में एक बड़ा हिस्सा है, अक्सर बेहतर रोज़गार और अवसरों की तलाश में रहती है। मुझे ऐसा लगा, जैसे एक बड़ी ऊर्जा है जो सही रास्ते पर नहीं लग पा रही है। सामाजिक प्रतिबंधों और आर्थिक कठिनाइयों के कारण युवाओं में असंतोष भी बढ़ता जा रहा है, और समय-समय पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिलते हैं। ये विरोध प्रदर्शन, चाहे वे आर्थिक मुद्दों पर हों या सामाजिक स्वतंत्रता पर, दिखाते हैं कि ईरान का समाज बदल रहा है और नई आकांक्षाएँ जन्म ले रही हैं। मुझे लगता है कि ईरान के भविष्य की दिशा तय करने में इस युवा आबादी की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी।

क्षेत्रीय प्रभाव और भू-राजनीतिक दाँव

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ईरान का मध्य पूर्व में क्षेत्रीय प्रभाव हमेशा से ही एक बड़ा मुद्दा रहा है। जब मैं इस क्षेत्र के नक्शे को देखता हूँ, तो मुझे लगता है जैसे ईरान एक ऐसे शतरंज के बोर्ड पर बैठा है जहाँ हर चाल के गहरे मायने हैं। इस्लामी क्रांति के बाद से, ईरान ने खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश की है, अक्सर अमेरिका और उसके सहयोगियों की नीतियों को चुनौती देते हुए। मुझे याद है, लेबनान में हिज़बुल्लाह, यमन में हूती विद्रोहियों और इराक में शिया मिलिशिया समूहों को ईरान का समर्थन मिलता रहा है, जिससे क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और भी बढ़ी है। सऊदी अरब और इज़राइल जैसे देश ईरान के बढ़ते प्रभाव को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं, जिससे क्षेत्र में तनाव हमेशा बना रहता है। मुझे ऐसा लगा, जैसे कई देश एक-दूसरे पर नज़र रखे हुए हैं, और एक छोटी सी चिंगारी बड़े संघर्ष में बदल सकती है।

सीरिया युद्ध और प्रॉक्सी संघर्ष

सीरिया में गृहयुद्ध क्षेत्रीय भू-राजनीतिक दाँवपेचों का एक बड़ा उदाहरण है। मुझे याद है, सीरियाई संघर्ष के दौरान, ईरान ने राष्ट्रपति बशर अल-असद की सरकार का खुलकर समर्थन किया, जिससे सऊदी अरब, तुर्की और पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंध और भी तनावपूर्ण हो गए। ईरान ने सीरिया में सैन्य सलाहकार और प्रॉक्सी लड़ाके भेजे, जिससे इस क्षेत्र में उसकी उपस्थिति और मज़बूत हुई। मुझे ऐसा लगा, जैसे ईरान इस संघर्ष को अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और प्रभाव के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानता हो। ये प्रॉक्सी संघर्ष ईरान को सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना अपने हितों को साधने का मौका देते हैं, लेकिन साथ ही क्षेत्रीय अस्थिरता को भी बढ़ावा देते हैं। यह दिखाता है कि कैसे ईरान अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए विभिन्न रणनीतियों का इस्तेमाल करता है।

तेल की राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंध

तेल हमेशा से ईरान की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। मुझे याद है, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का ईरान की अर्थव्यवस्था और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर सीधा असर पड़ता है। ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है, और उसके तेल निर्यात पर लगे प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को भी प्रभावित किया है। मुझे ऐसा लगा, जैसे ईरान के पास एक ऐसा शक्तिशाली हथियार है जिसका इस्तेमाल वह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कर सकता है। ईरान ने हमेशा अपने तेल संसाधनों का उपयोग अपनी विदेश नीति के लक्ष्यों को प्राप्त करने और प्रतिबंधों का विरोध करने के लिए किया है। चीन और रूस जैसे देशों के साथ उसके बढ़ते संबंध भी इस तेल की राजनीति का हिस्सा हैं, जहाँ ईरान इन देशों को अपने तेल का खरीदार और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपना सहयोगी मानता है। यह दिखाता है कि कैसे ईरान अपने भू-राजनीतिक दाँवपेचों में आर्थिक लीवर का भी बखूबी इस्तेमाल करता है।

글 को समाप्त करते हुए

ईरान का इतिहास सचमुच किसी पुरानी कहानी जैसा लगता है, जहाँ हर मोड़ पर कुछ नया सीखने को मिलता है। शाह के दौर की चकाचौंध से लेकर क्रांति के उथल-पुथल, युद्ध की विभीषिका और फिर आज के दौर की जटिलताओं तक, इस देश ने बहुत कुछ देखा है। मुझे लगता है कि ईरान हमें सिखाता है कि किसी भी राष्ट्र की पहचान सिर्फ़ उसके शासकों से नहीं, बल्कि उसकी जनता के सपनों, संघर्षों और अटूट दृढ़ता से बनती है। यह एक ऐसा देश है जो हमेशा से अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश करता रहा है, भले ही उसे कितनी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़ा हो।

जानने लायक उपयोगी जानकारी

1. शाह का पश्चिमीकरण: मोहम्मद रज़ा पहलवी ने ईरान को आधुनिक और पश्चिमी शैली में ढालने की कोशिश की, जिससे शिक्षा, बुनियादी ढाँचे और महिलाओं के अधिकारों में सुधार हुआ। लेकिन, इसने समाज के पारंपरिक और धार्मिक तबके में गहरा असंतोष भी पैदा किया, जिसने बाद में क्रांति का आधार तैयार किया।

2. इस्लामी क्रांति की महत्ता: 1979 की क्रांति ने सिर्फ़ शाह के शासन को ही नहीं पलटा, बल्कि ईरान को एक धर्मतांत्रिक इस्लामी गणतंत्र में बदल दिया। इसका प्रभाव ईरान की राजनीति, समाज और संस्कृति के हर पहलू पर पड़ा और आज भी इसकी छाप गहरी है।

3. इराक-ईरान युद्ध का स्थायी प्रभाव: यह आठ साल लंबा संघर्ष एक मानवीय त्रासदी था जिसने लाखों जानें लीं और दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बर्बाद कर दिया। इसने ईरानी पहचान को और मज़बूत किया और ईरान को आत्मनिर्भरता की ओर धकेला, जिससे उसकी सैन्य और औद्योगिक क्षमता का विकास हुआ।

4. परमाणु कार्यक्रम और भू-राजनीति: ईरान का परमाणु कार्यक्रम हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय तनाव का केंद्र रहा है। भले ही ईरान इसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बताता रहा हो, पश्चिमी देशों की चिंताएँ और प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था और उसकी वैश्विक स्थिति पर गहरा असर डाला है, जिससे कूटनीतिक दाँवपेच लगातार चलते रहते हैं।

5. आंतरिक संघर्ष और युवा आकांक्षाएँ: ईरान की राजनीति में सुधारवादियों और रूढ़िवादियों के बीच हमेशा एक तनाव रहा है। आर्थिक चुनौतियों और सामाजिक प्रतिबंधों के कारण युवा आबादी में असंतोष बढ़ता जा रहा है, जो समय-समय पर विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए सामने आता है और देश के भविष्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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महत्वपूर्ण बातों का सारांश

ईरान का सफर आधुनिकता और परंपरा, विदेशी प्रभावों और राष्ट्रीय स्वाभिमान के बीच एक जटिल नृत्य रहा है। शाह के दौर में पश्चिमीकरण की तेज़ रफ़्तार ने समाज के कुछ हिस्सों को तो आगे बढ़ाया, लेकिन साथ ही पारंपरिक मूल्यों को चुनौती देकर एक बड़े असंतोष को जन्म दिया। 1979 की इस्लामी क्रांति इसी असंतोष का परिणाम थी, जिसने ईरान को एक धर्मतांत्रिक राष्ट्र में बदल दिया और दुनिया के साथ उसके संबंधों को भी पूरी तरह से नया आयाम दिया। इराक के साथ आठ साल के भीषण युद्ध ने न केवल ईरान को भारी मानवीय और आर्थिक कीमत चुकाने पर मजबूर किया, बल्कि उसे आत्मनिर्भरता की ओर भी धकेला। आज, ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध उसकी अर्थव्यवस्था और विदेश नीति की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं, लेकिन इन सबके बावजूद, ईरान ने हमेशा अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और राष्ट्रीय पहचान को बनाए रखने की कोशिश की है। देश के भीतर सुधारवादी और रूढ़िवादी ताकतों के बीच का संघर्ष, और युवा आबादी की बढ़ती आकांक्षाएँ, ईरान के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यह एक ऐसा देश है जिसने हर चुनौती का सामना करते हुए अपनी अनूठी पहचान को बरकरार रखा है और आगे भी ऐसा करता रहेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖

प्र: आधुनिक ईरान को समझने के लिए 1979 की इस्लामी क्रांति इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?

उ: अरे दोस्तों, जब हम आधुनिक ईरान की बात करते हैं, तो 1979 की इस्लामी क्रांति को नज़रअंदाज़ कर ही नहीं सकते! यह सिर्फ एक सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि इसने ईरान के पूरे सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को बदल कर रख दिया था.
मुझे याद है, जब मैंने पहली बार इस क्रांति के बारे में पढ़ा था, तो मुझे लगा था कि यह कितनी बड़ी घटना थी, जिसने दुनिया को भी हैरान कर दिया था. इस क्रांति से पहले, ईरान पश्चिमी देशों के रंग में रंग रहा था, शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, जो पश्चिमीकरण को बढ़ावा दे रहे थे.
उन्होंने देश को आधुनिक बनाने की कोशिश की, लेकिन अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही थी, और उनकी आर्थिक नीतियां भी कुछ खास सफल नहीं हो पा रही थीं. लोगों में शाह की क्रूरता, भ्रष्टाचार और पश्चिमी जीवनशैली के प्रति काफी गुस्सा था, क्योंकि उन्हें लगा कि उनके इस्लामी मूल्यों का हनन हो रहा है.
और फिर आए अयातुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी! वह एक प्रभावशाली धार्मिक नेता थे, जिन्होंने ईरान के लोगों को एक नई दिशा दिखाई. उन्होंने शाह के शासन को गैर-इस्लामी बताया और लोगों को पश्चिमी प्रभाव से आज़ाद होने का सपना दिखाया.
जब शाह को देश छोड़कर भागना पड़ा और खुमैनी निर्वासन से वापस लौटे, तो लाखों लोग उनके स्वागत के लिए सड़कों पर उमड़ पड़े थे. यह सच में एक ऐतिहासिक पल था, जिसने क्रांति को एक नया मुकाम दिया.
क्रांति के बाद ईरान एक इस्लामी गणराज्य बन गया, जहाँ शरिया कानून लागू हुआ और धार्मिक नेताओं के हाथ में सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार आ गया. इसने न केवल ईरान को बदल दिया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन को हिला कर रख दिया और दुनिया भर में अन्य इस्लामी आंदोलनों को भी एक तरह से प्रेरणा दी.
तो देखा आपने, यह क्रांति कितनी गहरी थी!

प्र: संयुक्त राष्ट्र के हालिया प्रतिबंधों और अमेरिका-ईरान के बढ़ते तनाव का ईरान की अर्थव्यवस्था और आम लोगों पर क्या असर पड़ रहा है?

उ: सच कहूँ तो, जब भी मैं ईरान पर प्रतिबंधों की खबरें पढ़ता हूँ, तो मेरा दिल बैठ जाता है. मुझे लगता है कि इन राजनीतिक दांव-पेचों में सबसे ज़्यादा नुकसान आम जनता का ही होता है.
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र ने ईरान पर फिर से कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, और यूरोपीय देशों के साथ आखिरी दौर की बातचीत भी नाकाम रही है. ये प्रतिबंध ईरान के तेल, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्रों पर लगाए गए हैं, साथ ही हथियारों की खरीद-फरोख्त और परमाणु गतिविधियों पर भी रोक लगा दी गई है.
इन प्रतिबंधों से ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है. रियाल (ईरान की मुद्रा) रिकॉर्ड निचले स्तर पर है, और महंगाई दर तो आधिकारिक तौर पर 40% से ज़्यादा बताई जा रही है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर यह 50% से भी ऊपर है!
खाने-पीने की चीजें, मकान और बिजली-गैस जैसी बुनियादी ज़रूरतों के दाम आसमान छू रहे हैं. मुझे लगता है, यह स्थिति आम ईरानी परिवारों के लिए कितनी मुश्किल होगी, जब दाल-रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो जाता है.
अमेरिका और इज़राइल से तनाव भी लगातार बना हुआ है. अमेरिका ने हाल ही में ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे, और युद्ध का खतरा अभी भी मंडरा रहा है. ईरान के अधिकारी भी जवाब देने की धमकी दे रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता और बढ़ रही है.
मुझे लगता है, ऐसी स्थिति में लोगों के मन में हमेशा डर बना रहता होगा कि अगले पल क्या होगा. ये प्रतिबंध न केवल देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर रहे हैं, बल्कि अंदरूनी दमन बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है.
यह सच में एक दुखद स्थिति है, जो ईरान के लोगों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है.

प्र: ईरान का भू-राजनीतिक महत्व क्या है, और यह क्यों दुनिया की बड़ी शक्तियों के लिए हमेशा चर्चा का विषय बना रहता है?

उ: दोस्तों, ईरान का भू-राजनीतिक महत्व इतना ज़्यादा है कि यह हमेशा से दुनिया की बड़ी शक्तियों के लिए एक पहेली और एक चर्चा का विषय बना रहा है. मैंने जब भी मध्य पूर्व के बारे में पढ़ा है, तो ईरान का नाम सबसे ऊपर आता है.
सबसे पहली बात तो यह कि ईरान की भौगोलिक स्थिति बहुत रणनीतिक है. यह मध्य एशिया, पश्चिमी एशिया और यूरेशिया के चौराहे पर स्थित है. कैस्पियन सागर और हिंद महासागर (फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी) दोनों से इसकी सीमाएं लगती हैं, जो इसे समुद्री व्यापार और ऊर्जा मार्गों के लिए एक महत्वपूर्ण कड़ी बनाता है.
कल्पना कीजिए, यह कितना महत्वपूर्ण होगा! और फिर आती है तेल और प्राकृतिक गैस की बात. ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में से एक है.
आप सोच सकते हैं, तेल ही तो आज की दुनिया की रगों में दौड़ता है, तो ऐसे में ईरान की भूमिका कितनी अहम हो जाती है. पश्चिमी देश, रूस और चीन सभी इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं, और ईरान उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोहरा है.
ईरान का इतिहास भी इतना समृद्ध रहा है, कि इसने अपनी एक अलग सांस्कृतिक पहचान बनाई है. शिया इस्लाम का केंद्र होने के कारण भी इसकी एक खास धार्मिक और राजनीतिक भूमिका है, जो इसे पड़ोसी देशों से अलग करती है.
ईरान हमेशा से अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता रहा है, और यह बात कई बड़ी शक्तियों को पसंद नहीं आती. हाल के वर्षों में, ईरान का परमाणु कार्यक्रम, इज़राइल के साथ तनाव, और खाड़ी क्षेत्र में इसकी बढ़ती भूमिका ने इसे वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला दिया है.
अमेरिका और इज़राइल इसे परमाणु हथियार बनाने से रोकना चाहते हैं, जबकि रूस और चीन जैसे देश इसके साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हैं. मुझे तो लगता है कि ईरान की यही जटिल और शक्तिशाली स्थिति उसे दुनिया के लिए इतना दिलचस्प और कभी-कभी चुनौतीपूर्ण भी बना देती है.

📚 संदर्भ